Alankar Kise Kahate Hain | अलंकार के कितने भेद होते हैं

Hindi Vyakaran की इस सीरीज में Alankar Kise Kahate Hain, अलंकार के कितने भेद होते हैं, Types of Alankar in Hindi को उदाहरण सहित बिलकुल ही आसान तरीके से सीखेंगे।

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Alankar Kise Kahate hain | अलंकार की परिभाषा

What is Alankar in Hindi : अलंकार का शाब्दिक अर्थ है आभूषण। 

“काव्य (पद्यांश) की शोभा बनाने वाले मनोरंजक ढंग को अलंकार कहते हैं।“

अलंकार के कितने भेद होते हैं

अलंकार के 3 भेद होते हैं –

  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार
  3. उभयालंकार

1. शब्दालंकार

जहाँ पर शब्दों के इस्तेमाल से सौंदर्य में वृद्घि और काव्य में चमत्कार आता है, वहाँ शब्दालंकार होता है।

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शब्दालंकार के कितने भेद होते हैं

शब्दालंकार के 3 भेद होते हैं –

  1. अनुप्रास अलंकार
  2. यमक अलंकार
  3. श्लेष अलंकार

1. अनुप्रास अलंकार 

वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं। 
आवृत्ति का मतलब है किसी वर्ण का एक से ज्यादा बार आना।

1. अनुप्रास अलंकार किसे कहते हैं 

“जब काव्य में किसी वर्ण की आवृत्ति एक से ज्यादा बार होती है, तो उसे अनुप्रास अलंकार कहते हैं।“

इस अलंकार में एक ही वर्ण का बार – बार इस्तेमाल होता है।

उदाहरण –

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।

उपरोक्त मेंवर्ण की आवृत्ति एक से ज्यादा बार हुई है अतः यहां अनुप्रास अलंकार है।

अन्य उदाहरण –

रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम ( वर्ण की आवृत्ति)

चारु चन्द्र की चंचल किरणे खेल रही हैं जल थल में।( वर्ण की आवृत्ति)

मैया मोरी मैं नहि माखन खायो। ( वर्ण की आवृत्ति)

Anupras Alankar Ke Bhed | अनुप्रास अलंकार के भेद

अनुप्रास अलंकार  3 प्रकार के होते हैं- 

1. छेकानुप्रास अलंकार

2. वृत्यनुप्रास अलंकार

3. लाटानुप्रास अलंकार

1. छेकानुप्रास अलंकार

जहाँ स्वरूप और क्रम से अनेक व्यंजनों की आवृत्ति एक बार हो, वहाँ छेकानुप्रास होता है।

जैसे –

रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै,

साँसैं भरि आँसू भरि कहत दई दई।

उपरोक्त में रीझि-रीझि, रहसि-रहसि, हँसि-हँसि, और दई-दई में छेकानुप्रास अलंकार है, क्योंकि व्यंजन वर्णों की आवृत्ति उसी क्रम और स्वरूप में हुई है।

2. वृत्त्यनुप्रास अलंकार

जहाँ एक व्यंजन की आवृत्ति एक या अनेक बार हो, वहाँ वृत्त्यनुप्रास अलंकार होता है।

जैसे –

सपने सुनहले मन भाये।

उपरोक्त में वर्ण की आवृत्ति एक बार हुई है। अतः यह वृत्यनुप्रास अलंकार है।

3. लाटानुप्रास अलंकार

जहां एक ही अर्थ वाले शब्दों की आवृत्ति होती है लेकिन अन्वय की भिन्नता से अर्थ बदल जाता है। वहां लाटानुप्रास अलंकार होता है।

जैसे –

पूत सपूत तो क्यों धन संचै?

पूत कपूत तो क्यों धन संचै?

स्पष्टीकरण

यहाँ उन्हीं शब्दों की आवृत्ति होने पर भी पहली पंक्ति के शब्दों का अन्वय ‘सपूत के साथ और दूसरी काफत के साथ लगती है, जिससे अर्थ बदल जाता है। (पद्य का भाव यह है कि यदि तुम्हारा पुत्र सुपुत्र है तो धन-संचय की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह स्वयं कमाकर धन का ढेर लगा देगा। यदि वह कुपुत्र है तो भी धन संचय निरर्थक है, क्योंकि यह सारा धन व्यसनों में उड़ा देगा। इस प्रकार यहाँ लाटानुप्रास है।

2. यमक अलंकार किसे कहते हैं 

जिस जगह एक ही शब्द (व्याकरण) एक से अधिक बार प्रयुक्त हो, लेकिन उस शब्द का अर्थ हर बार भिन्न हो, वहाँ यमक अलंकार होता है।

उदाहरण –

कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।

वा खाये बौराय जग, वा पाये बौराय।

यहाँ कनक शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है जिसमे एक कनक का अर्थ है- धतूरा और दूसरे का अर्थ स्वर्ण है।

यमक अलंकार के दो भेद होते हैं –

1. अभंगपद यमक : जहाँ दो पूर्ण शब्दों की समानता हो। इसमें शब्द पूर्ण होने के कारण दोनों शब्द सार्थक होते हैं।

जैसे- ‘कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।

2. सभंगपद यमक : यहाँ शब्दों को तोड़कर अक्षर-समूह की समता बनती है। इसमें एक या दोनों अक्षर समूह निरर्थक होते हैं।

जैसे –

पच्छी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर, तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के ।

3. श्लेष Alankar Kise Kahate Hain

जब एक ही शब्द बिना आवृत्ति के दो या दो से ज्यादा अर्थ प्रकट करे, तो वहां श्लेष अलंकार होता है।

जैसे-

चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गैंभीर।

को घटि ए वृषभानुजा, वे हलधर के वीर।

स्पष्टीकरण-

यहाँ वृषभानुजा और हलधर शब्दों के दो-दो अर्थ हैं।

वृषभानु + जा वृषभानु की पुत्री (राधा)।

वृषभ + अनुजा बैल की बहन (गाय)।

हलधर (1) बलराम, (2) बैल इस प्रकार यहाँ वृषभानुजा में श्लेष अलंकार है।

यमक और श्लेष में अन्तर-

जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आकर अलग – अलग अर्थ देता है तो यमक कहलाता है और जब एक शब्द बिना आवृत्ति के ही कई अर्थ देता है तो श्लेष कहलाता है। यमक में एक शब्द की आवृत्ति होती है और श्लेष में बिना आवृत्ति के ही शब्द एकाधिक अर्थ देता है।

2. अर्थालंकार

जहाँ काव्य की शोभा का कारण अर्थ होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है।

Arthalankar Ke Bhed

अर्थालंकार निम्न भेद हैं –

  1. उपमा अलंकार 
  2. उत्प्रेक्षा अलंकार 
  3. रूपक अलंकार
  4. प्रतीप अलंकार
  5. अतिशयोक्ति अलंकार
  6. भ्रांति अलंकार
  7. संदेह अलंकार
  8. दृष्टांत अलंकार
  9. अनन्वय अलंकार

1. उपमा अलंकार

उपमेय और उपमान के समान धर्मकथन को उपमा अलंकार कहते हैं।

जैसे –

  • मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है।
  • तापसबाला सी गंगा कल।

उपमा अलंकार के निम्नलिखित 4 अंग होते हैं –

उपमेय- जिसके लिए उपमा दी जाती है।

जैसे- उपर्युक्त उदाहरणों में मुख, गंगा।

उपमान उपमेय की जिसके साथ तुलना (उपमा) की जाती है।

जैसे चन्द्रमा, तापसबाला।

साधारण धर्म जिस गुण या विषय में उपमेय और उपमान की तुलना की जाती है।

जैसे- सुन्दर (सुन्दरता), कलता (सुहावनी)।

वाचक शब्द – जिस शब्द के द्वारा उपमेय और उपमान की समानता व्यक्त की जाती है।

जैसे- समान, सी, तुल्य, सदृश, इव, सरिस, जैसा आदि।

ये चारों अंग जहाँ पाये जाते हैं, वहाँ पूर्णोपमालंकार होता है।

2. उत्प्रेक्षा Alankar Kise Kahate Hain

जहाँ उपमेय की उपमान के रूप में सम्भावना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

जैसे –

सोहत ओढ़ पीत पटु, स्याम सलोने गात।

मनी नीलमनि सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात।

स्पष्टीकरण यहाँ पीताम्बर ओढ़े हुए श्रीकृष्ण के श्याम शरीर (उपमेय) की प्रातः कालीन सूर्य की प्रभा से सुशोभित नीलमणि पर्वत (उपमान) के रूप में सम्भावना किये जाने से उत्प्रेक्षा अलंकार है। मनौ यहाँ पर वाचक शब्द है। इस अलंकार में जनु, जनहुँ, मनु, मनहूँ, मानो, इव आदि वाचक शब्द आते हैं।

3. रूपक Alankar Kise Kahate Hain

जहाँ उपमेय और उपमान को एक ही रूप में प्रकट किया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

जैसे –

अरुन सरोरुह कर चरन, दृग-खंजन मुख चंद।

समै आइ सुंदरि सरद, काहि न करति अनंद ॥

स्पष्टीकरण- इस उदाहरण में शरद् ऋतु में सुन्दरी का, कमल में हाथ-पैरों का, खंजन में आँखों का और चन्द्रमा में मुख का भेदरहित आरोप होने से रूपक अलंकार है।

4. प्रतीप अलंकार

प्रतीप शब्द का अर्थ है उल्टा। जहाँ उपमेय का कथन उपमान रूप में और उपमान का कथन उपमेय रूप में किया जाता है, वहाँ प्रतीप अलंकार होता है। यह उपमा अलंकार का उल्टा होता है

जैसे –

उसी तपस्वी से लम्बे थे देवदारु दो-चार खंड़े ।

स्पष्टीकरण यहाँ मनु (उपमेय) को देवदारु वृक्ष (उपमान) के समान लम्बा बताने की बजाय देवदारु को मनु के समान लम्बा बताया गया है। इस प्रकार यहाँ उपमान को उपमेय बना देने से प्रतीप अलंकार है।

5. अतिशयोक्ति अलंकार किसे कहते हैं 

जहाँ उपमेय का बहुत बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाता है, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

जैसे –

करी बिरह ऐसी तऊ, गैल न छाड़तु नीचु ।।

दीनै हूँ चसमा चखनु, चाहै लहै न मीचु॥

6. भ्रान्तिमान अलंकार

जहाँ समानता के कारण भ्रमवश उपमेय में उपमान का निश्चयात्मक ज्ञान हो, वहाँ भ्रान्तिमान अलंकार होता है।

जैसे- रस्सी (उपमेय) को सॉप (उपमान) समझ लेना ।।

कपि करि हृदय बिचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब।

जानि अशोक अँगार, सीय हरषि उठि कर गहेउ ।

स्पष्टीकरण यहाँ सीताजी श्रीराम की हीरकजटित अँगूठी को अशोक वृक्ष द्वारा प्रदत्त अंगारा समझकर उठा लेती हैं। अँगूठी (उपमेय) में उन्हें अंगारे (उपमान) का निश्चयात्मक ज्ञान होने से यहाँ भ्रान्तिमान अलंकार है।

7. सन्देह अलंकार

जब किसी वस्तु में उसी के जैसे दूसरी वस्तु का सन्देह हो जाए और कोई निश्चयात्मक ज्ञान न हो, तो वहां सन्देह अलंकार होता है।

जैसे –

परिपूरन सिन्दूर पूर कैध मंगल घट।

किर्धी सक्र को छत्रं मढ्यो मानिक मयूख पट ॥

स्पष्टीकरण यहाँ लाल वर्ण वाले सूर्य में सिन्दूर भरे हुए घट तथा लाल रंग वाले माणिक्य में जड़े हुए। छेत्र का सन्देह होने से सन्देह अलंकार है।

सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर

सन्देह अलंकारों में उपमेय में उपमान को सन्देहमात्र होता है, निश्चयात्मक ज्ञान नहीं।

जैसे- यह रस्सी है या साँप।

इसमें रस्सी (उपमेय) में साँप (उपमान) का सन्देह होता है, निश्चय नहीं लेकिन भ्रान्तिमा उपमेय में उपमान का निश्चय हो जाता है

जैसे- रस्सी को साँप समझकर कहना कि ‘यह साँप है ।

8. दृष्टान्त अलंकार

जहाँ उपमेय और उपमान दो ऐसे वाक्य हों कि उनके साधारण धर्म में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव हो, वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है

जैसे –

बसै बुराई जासु तन, ताही को सम्मान ।

भलो भलो कहि छाँड़िये, खोटे ग्रह जप-दान ॥

स्पष्टीकरण- इस दोहे में पहली पंक्ति उपमेय वाक्य तथा द्वितीय पंक्ति उपमान वाक्य है । इन दोनों वाक्यों में सम्मान और जप-दान दो भिन्न-भिन्न धर्म कहे गये हैं। इन दोनों में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव है, अर्थात् भिन्न-भिन्न होते हुए भी इन दोनों बातों का आय एक ही है; क्योंकि ‘सम्मान करना तथा ‘जप-दान करना एक ही भाव के द्योतक हैं।

9. अनन्वय अलंकार

जहाँ उपमेय को ही उपमान मान लिया जाये, कोई दूसरा उपमान न लाया जाए, वहाँ अनन्वय अलंकार होता है; जैसे –

नागर नन्दकिसोर से नागर नन्दकिसोर।

स्पष्टीकरण- यहाँ नन्दकिशोर (उपमेय) की उपमा नन्दकिशोर (उपमान) से ही दी गयी है, कोई अन्य उपमान नहीं लाया गया है।

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